तो दो निरपेक्ष वस्तुएं हुई और जिन सब युक्तियों से आत्मा का सर्वव्यापी होना प्रमाणित होगा, वे युक्तियां प्रकृति के पक्ष में भी प्रयुक्त हो सकेंगी, इसलिए वह भी समग्र देश-काल-निमित्त के अतीत होगी, प्रकृति यदि इस प्रकार की ही हो, तो उसका किसी प्रकार का परिणाम अथा विकास नहीं होगा। इससे निष्कर्ष निकला कि दो निरपेक्ष अथवा पूर्ण वस्तुएं स्वीकार करनी होती हैं और
138 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
यह असम्भव है।’’ (अष्टम खंड, पृष्ठ 67)
तो दो निरपेक्ष वस्तुएं हुई और जिन सब युक्तियों से आत्मा का सर्वव्यापी होना प्रमाणित होगा, वे युक्तियां प्रकृति के पक्ष में भी प्रयुक्त हो सकेंगी, इसलिए वह भी समग्र देश-काल-निमित्त के अतीत होगी, प्रकृति यदि इस प्रकार की ही हो, तो उसका किसी प्रकार का परिणाम अथा विकास नहीं होगा। इससे निष्कर्ष निकला कि दो निरपेक्ष अथवा पूर्ण वस्तुएं स्वीकार करनी होती हैं और
138 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
यह असम्भव है।’’ (अष्टम खंड, पृष्ठ 67)