वेदान्त दर्शन के अनुसार प्रकृति देश-काल निमित्त के नियम के अधीन हे, इसलिए परिवर्तनशील और नश्वर है जबकि आत्मा देश-काल-निमित्त के अतीत अपरिवर्तनशील और अनप्त है और इस जगत् के सृष्टिकर्ता निरपेक्ष और अनन्त ईश्वर ही का एक अंश है। इसमें फिर कर्मवाद और मायावाद के सिद्वान्त जोड़ लिए गए। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और इससे शोषण तथा व्यक्तिगत सम्पत्िा की रक्षा का दर्शन पूर्ण हो जाता है। व्यक्तिगत सम्पत्िा की रक्षा के पूज्य ग्रंथ गीता में हम श्रीकृष्ण को कहते सुनते हैं:
वेदान्त दर्शन के अनुसार प्रकृति देश-काल निमित्त के नियम के अधीन हे, इसलिए परिवर्तनशील और नश्वर है जबकि आत्मा देश-काल-निमित्त के अतीत अपरिवर्तनशील और अनप्त है और इस जगत् के सृष्टिकर्ता निरपेक्ष और अनन्त ईश्वर ही का एक अंश है। इसमें फिर कर्मवाद और मायावाद के सिद्वान्त जोड़ लिए गए। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और इससे शोषण तथा व्यक्तिगत सम्पत्िा की रक्षा का दर्शन पूर्ण हो जाता है। व्यक्तिगत सम्पत्िा की रक्षा के पूज्य ग्रंथ गीता में हम श्रीकृष्ण को कहते सुनते हैं: