विशिष्टाद्वैतवाद और अद्वैतवाद की संक्षिप्त व्याख्या करेंगे।
द्वैतवाद धर्म की पहली सीढ़ी है। इसके अनुसार ईश्वर स्वयं ही विश्व और आत्मा बन गया है। हम सब उसी के अंश हैं, हम सब एक हैं। फिर भी मनुष्य और मनुष्य में, मनुष्य और ईश्वर में एक कठोर व्यैक्तता है, जो पृथक् है और पृथक् नहीं भी ।
अद्वैतवाद तीसरी और अंतिम सीढ़ी है। इसके अनुसार अनन्त का अंत नहीं हो सकता। यदि उसके अंश किए जा सकते हैं तो प्रत्येक अंश अनन्त ही होगा। यदि
विशिष्टाद्वैतवाद और अद्वैतवाद की संक्षिप्त व्याख्या करेंगे।
द्वैतवाद धर्म की पहली सीढ़ी है। इसके अनुसार ईश्वर स्वयं ही विश्व और आत्मा बन गया है। हम सब उसी के अंश हैं, हम सब एक हैं। फिर भी मनुष्य और मनुष्य में, मनुष्य और ईश्वर में एक कठोर व्यैक्तता है, जो पृथक् है और पृथक् नहीं भी ।
अद्वैतवाद तीसरी और अंतिम सीढ़ी है। इसके अनुसार अनन्त का अंत नहीं हो सकता। यदि उसके अंश किए जा सकते हैं तो प्रत्येक अंश अनन्त ही होगा। यदि