न होने तक कोई धर्म की कथा ध्यान से न सुनेगा। इसलिए कहता हूं, पहले अपने में अंतनिर्हित शक्ति को जाग्रत कर, फिर देश के समस्त व्यक्तियों में जितना सम्भव हो, उस शक्ति के प्रति विश्वास जमा। पहले अन्न की व्यवस्था कर, बाद में उन्हें धर्म प्राप्त करने की शिक्षा दे। अब अधिक बैठे रहने का समय नहीं-कब किसकी मृत्यु होगी, कौन कह सकता है?
बात करते क्षोभ, दुःख और दया के सम्मिलित आवेश से स्वामीजी के मुखमंडल पर एक अपूर्व तेज उद्भासित
न होने तक कोई धर्म की कथा ध्यान से न सुनेगा। इसलिए कहता हूं, पहले अपने में अंतनिर्हित शक्ति को जाग्रत कर, फिर देश के समस्त व्यक्तियों में जितना सम्भव हो, उस शक्ति के प्रति विश्वास जमा। पहले अन्न की व्यवस्था कर, बाद में उन्हें धर्म प्राप्त करने की शिक्षा दे। अब अधिक बैठे रहने का समय नहीं-कब किसकी मृत्यु होगी, कौन कह सकता है?
बात करते क्षोभ, दुःख और दया के सम्मिलित आवेश से स्वामीजी के मुखमंडल पर एक अपूर्व तेज उद्भासित