हो उठा। आंखों से मानो अग्नि कण निकलने लगे। उनकी उस समय की दिव्य मूर्ति का दर्शन कर भय और विस्मय के कारण शिष्य के मुख से बात न निकल सकी। कुछ समय रूककर स्वामी जी फिर कहने लगे, ‘‘यथा समय देश में कर्म तत्परता और आत्मनिर्भरता अवश्य आ जाएगी-मैं स्पष्ट देख रहा हूं-ज्ीमतम पे दव मेबंचम-दूसरी गति ही नहीं। जो लोग बुद्विमान हैं, वे भावी तीन युगों का चित्र सामने प्रत्यक्ष देख सकते हैं।
‘‘श्री रामकृष्ण के जन्म ग्रहण समय ही से पूर्वाकाश में अरूणोदय हुआ है-समय
हो उठा। आंखों से मानो अग्नि कण निकलने लगे। उनकी उस समय की दिव्य मूर्ति का दर्शन कर भय और विस्मय के कारण शिष्य के मुख से बात न निकल सकी। कुछ समय रूककर स्वामी जी फिर कहने लगे, ‘‘यथा समय देश में कर्म तत्परता और आत्मनिर्भरता अवश्य आ जाएगी-मैं स्पष्ट देख रहा हूं-ज्ीमतम पे दव मेबंचम-दूसरी गति ही नहीं। जो लोग बुद्विमान हैं, वे भावी तीन युगों का चित्र सामने प्रत्यक्ष देख सकते हैं।
‘‘श्री रामकृष्ण के जन्म ग्रहण समय ही से पूर्वाकाश में अरूणोदय हुआ है-समय