योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

एक राष्ट्र नेता ही कह सकता है। धर्म उनके लिए गौण वस्तु थी, देश को राजनीतिक संघर्ष के लिए तैयार करना था-‘अरूणोदय की बेला है-उठो जागो।’ यह संदेश घर-घर पहुंचाना ‘ही उनका प्राणान्त प्रण था। अतएव उनका चिंतन दिन-दिन वैज्ञानिक होता चला गया। 1900 में वे दोबारा विदेश-यात्रा पर गए। तब हम उन्हें 20 मार्च को सैनफफ्रांसिस्को में कहते हुए सुनते हैं:

‘‘क्रमशः ‘प्रकृति’ शब्द तथा एकरूपता की धारणा का प्रयोग, जीवन और मन के व्यापारों के सम्बंध में भी होने लगा। वनस्पति,


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एक राष्ट्र नेता ही कह सकता है। धर्म उनके लिए गौण वस्तु थी, देश को राजनीतिक संघर्ष के लिए तैयार करना था-‘अरूणोदय की बेला है-उठो जागो।’ यह संदेश घर-घर पहुंचाना ‘ही उनका प्राणान्त प्रण था। अतएव उनका चिंतन दिन-दिन वैज्ञानिक होता चला गया। 1900 में वे दोबारा विदेश-यात्रा पर गए। तब हम उन्हें 20 मार्च को सैनफफ्रांसिस्को में कहते हुए सुनते हैं:

‘‘क्रमशः ‘प्रकृति’ शब्द तथा एकरूपता की धारणा का प्रयोग, जीवन और मन के व्यापारों के सम्बंध में भी होने लगा। वनस्पति,


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