गए मनुष्य का ‘यथार्थ रूप’ भाषण में उन्होंने कहा था:
‘‘आजकल यह विवाद चल रहा है कि क्या पंचभूतों की समष्टि यह देह की आत्मा, चिंतन-शक्ति या विचार आदि नामों से परिचित शक्तियों के विकास का कारण है? अथवा चिंतन शक्ति ही देहोत्पत्िा का कारण है? निश्चय ही संसार के सभी धर्म कहते हैं कि विचार नामक शक्ति ही शरीर की प्रकाशक है, और वे इसके विपरीत मत में आस्था नहीं रखते।’’ (द्वितीय खंड, पृष्ठ 8)
और जनवरी, 1894 को अपने मद्रासी शिष्यों
गए मनुष्य का ‘यथार्थ रूप’ भाषण में उन्होंने कहा था:
‘‘आजकल यह विवाद चल रहा है कि क्या पंचभूतों की समष्टि यह देह की आत्मा, चिंतन-शक्ति या विचार आदि नामों से परिचित शक्तियों के विकास का कारण है? अथवा चिंतन शक्ति ही देहोत्पत्िा का कारण है? निश्चय ही संसार के सभी धर्म कहते हैं कि विचार नामक शक्ति ही शरीर की प्रकाशक है, और वे इसके विपरीत मत में आस्था नहीं रखते।’’ (द्वितीय खंड, पृष्ठ 8)
और जनवरी, 1894 को अपने मद्रासी शिष्यों