के नाम उन्होंने शिकागो से एक पत्र में लिखा था:
‘‘जीवन में मेरी सर्वोंच्च अभिलाषा यही है कि एक ऐसा चक्र-प्रवर्तन कर दूं जो उच्च एवं श्रेष्ठ विचारों को सबके द्वार-द्वार पहुंचा दे और फिर स्त्री-पुरूष अपने भाग्य का निर्णय स्वयं कर लें। हमारे पूर्वजों तथा अन्य देशों ने भी जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर क्या विचार किया है, यह सर्वसाधारण को जानने दो। विशेषकर उन्हें यह देखने दो कि और लोग इस समय क्या कर रहे हैं और तब
143 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
के नाम उन्होंने शिकागो से एक पत्र में लिखा था:
‘‘जीवन में मेरी सर्वोंच्च अभिलाषा यही है कि एक ऐसा चक्र-प्रवर्तन कर दूं जो उच्च एवं श्रेष्ठ विचारों को सबके द्वार-द्वार पहुंचा दे और फिर स्त्री-पुरूष अपने भाग्य का निर्णय स्वयं कर लें। हमारे पूर्वजों तथा अन्य देशों ने भी जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर क्या विचार किया है, यह सर्वसाधारण को जानने दो। विशेषकर उन्हें यह देखने दो कि और लोग इस समय क्या कर रहे हैं और तब
143 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द