योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

पर जैसे ही बूढ़ा वहां से हटा नरेन्द्र फिर उसी ऊंची चोटी पर चढ़ बैठा। लेकिन उसके साथी की हिम्मत नहीं पड़ी। वह भयभीत-सा नीचे खड़ा रहा। ‘‘आओ न ऊपर’’ नरेन्द्र ने उससे कहा। ‘‘नहीं भाई, ब्रह्मराक्षस की बात कौन जाने? न मालूम कब किधर से आकर गर्दन मरोड़ डाले’’। साथी ने उत्तर दिया। ‘‘धत्! तू भी निपट मूर्ख है।’’ नरेन्द्र बोला, ‘‘तेरे दादा डराने के लिए झूठ-मूठ बात बना गए। अगर पेड़ पर सचमुच ब्रह्मराक्षस रहता तो उसने मेरी गर्दन कब की मरोड़ दी होती।’’


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पर जैसे ही बूढ़ा वहां से हटा नरेन्द्र फिर उसी ऊंची चोटी पर चढ़ बैठा। लेकिन उसके साथी की हिम्मत नहीं पड़ी। वह भयभीत-सा नीचे खड़ा रहा। ‘‘आओ न ऊपर’’ नरेन्द्र ने उससे कहा। ‘‘नहीं भाई, ब्रह्मराक्षस की बात कौन जाने? न मालूम कब किधर से आकर गर्दन मरोड़ डाले’’। साथी ने उत्तर दिया। ‘‘धत्! तू भी निपट मूर्ख है।’’ नरेन्द्र बोला, ‘‘तेरे दादा डराने के लिए झूठ-मूठ बात बना गए। अगर पेड़ पर सचमुच ब्रह्मराक्षस रहता तो उसने मेरी गर्दन कब की मरोड़ दी होती।’’


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