योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

कान, नाक, जीभ और त्वचा -के जरिए वस्तुगत बाह्मजगत की असंख्य घटनाओं का प्रतिबिम्ब उसके मस्तिष्क पर पड़ता है। ज्ञान शुरू में इंद्रिए ग्राह्म होता है। धारणात्मक ज्ञान अर्थात् विचारों की स्थिति में तब छलांग भी जा सकती है, जब इंद्रिय-ग्राह्म ज्ञान काफी मात्रा में प्राप्त कर लिया जाता है। यह ज्ञान प्राप्ति की एक प्रक्रिया है। यह

145 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

ज्ञान प्राप्ति की समूची प्रक्रिया की पहली मंज़िल है, एक ऐसी मंज़िल


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कान, नाक, जीभ और त्वचा -के जरिए वस्तुगत बाह्मजगत की असंख्य घटनाओं का प्रतिबिम्ब उसके मस्तिष्क पर पड़ता है। ज्ञान शुरू में इंद्रिए ग्राह्म होता है। धारणात्मक ज्ञान अर्थात् विचारों की स्थिति में तब छलांग भी जा सकती है, जब इंद्रिय-ग्राह्म ज्ञान काफी मात्रा में प्राप्त कर लिया जाता है। यह ज्ञान प्राप्ति की एक प्रक्रिया है। यह

145 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

ज्ञान प्राप्ति की समूची प्रक्रिया की पहली मंज़िल है, एक ऐसी मंज़िल


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