जाने और फिर ज्ञान से व्यवहार की तरफ लौटन आने की प्रक्रिया को बार-बार दोहराने से होती है। यही माक्र्सवाद का ज्ञान-सिद्वान्त है, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का ज्ञान सिद्वान्त है।’’ (चार दार्शनिक लेख, पृष्ठ 150-51)
अब देखिए, विवेकानन्द अपने उक्त भाषणों में आगे कहते हैं:
‘‘जड़ पदार्थ और मन दोनों ही वास्तव में शक्ति ही हैं और यदि तुम उन दोनों का विश्लेषण गहराई से करो, तो पाओगे कि मूलतः दोनों एक है। बाह्म शक्ति किस प्रकार आन्तरिक शक्ति को प्रेरित कर सकती है,
जाने और फिर ज्ञान से व्यवहार की तरफ लौटन आने की प्रक्रिया को बार-बार दोहराने से होती है। यही माक्र्सवाद का ज्ञान-सिद्वान्त है, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का ज्ञान सिद्वान्त है।’’ (चार दार्शनिक लेख, पृष्ठ 150-51)
अब देखिए, विवेकानन्द अपने उक्त भाषणों में आगे कहते हैं:
‘‘जड़ पदार्थ और मन दोनों ही वास्तव में शक्ति ही हैं और यदि तुम उन दोनों का विश्लेषण गहराई से करो, तो पाओगे कि मूलतः दोनों एक है। बाह्म शक्ति किस प्रकार आन्तरिक शक्ति को प्रेरित कर सकती है,