इसी बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे कहीं एक-दूसरे से संयुक्त होती हैं-वे अवश्यमेव अखंड हैं और इसलिए वे मूलतः एक ही शक्ति हैं, अतः मन और जड़ पदार्थ को भिन्न समझने का कोई कारण नहीं है। मन जड़ पदार्थ के रूप में परिवर्तित होता है और जड़ पदार्थ मन
146 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
के रूप में। विचार शक्ति ही स्नायु-शक्ति, पेशी-शक्ति बन जाती है और स्नायु-शक्ति एवं पेशी-शक्ति विचार-शक्ति। प्रकृति ही यह सब शक्ति है, चाहे वह जड़ वस्तु के रूप में अभिव्यक्त् हो,
इसी बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे कहीं एक-दूसरे से संयुक्त होती हैं-वे अवश्यमेव अखंड हैं और इसलिए वे मूलतः एक ही शक्ति हैं, अतः मन और जड़ पदार्थ को भिन्न समझने का कोई कारण नहीं है। मन जड़ पदार्थ के रूप में परिवर्तित होता है और जड़ पदार्थ मन
146 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
के रूप में। विचार शक्ति ही स्नायु-शक्ति, पेशी-शक्ति बन जाती है और स्नायु-शक्ति एवं पेशी-शक्ति विचार-शक्ति। प्रकृति ही यह सब शक्ति है, चाहे वह जड़ वस्तु के रूप में अभिव्यक्त् हो,