चाहे मन के रूप में।’’
पदार्थ-चेतना में और चेतना पदार्थ में निरन्तर बदलती रहती है, इस द्वन्द्वात्मक सिद्वान्त को लेकर विवेकानन्द वेदान्त का भौतिकवाद से समन्वय करने का यों प्रयास करते हैं:
‘‘सूक्ष्मतम मन एवं सूक्ष्मतम जड़ पर्दााि के बीच केवल मात्रा ही का अंतर है। अतएव, समस्त विश्व को मन या जड़ दोनों कहा जा सकता है। इन दोनों में थ्या कहें, यह महत्व नहीं रहता। तुम मन को सूक्ष्म जड़ पदार्थ कह सकते हो, अथवा शरीर को मन का स्थूल रूप। तुम किसे किस नाम से पुकारते हो,
चाहे मन के रूप में।’’
पदार्थ-चेतना में और चेतना पदार्थ में निरन्तर बदलती रहती है, इस द्वन्द्वात्मक सिद्वान्त को लेकर विवेकानन्द वेदान्त का भौतिकवाद से समन्वय करने का यों प्रयास करते हैं:
‘‘सूक्ष्मतम मन एवं सूक्ष्मतम जड़ पर्दााि के बीच केवल मात्रा ही का अंतर है। अतएव, समस्त विश्व को मन या जड़ दोनों कहा जा सकता है। इन दोनों में थ्या कहें, यह महत्व नहीं रहता। तुम मन को सूक्ष्म जड़ पदार्थ कह सकते हो, अथवा शरीर को मन का स्थूल रूप। तुम किसे किस नाम से पुकारते हो,