उससे कोई अंतर नहीं है। गलत ढंग से सोचने के कारण ही भौतिकवाद एवं अध्यात्मवाद के बीच संघर्ष से कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं। वास्तव में दोनों में कोई भेद नहीं है। मुझमें और हीनतम सुअर में केवल मात्रा का अंतर है-सुअर कम अभिव्यक्त हुआ, मैं अधिक। कभी मैं उससे बुरा हो जाता हूं, कभी सुअर मुझसे अच्छा रहता है।’’ (पृष्ठ 122)
दरअसल स्वामी जी कहना यह चाहते हैं कि मैं भी ब्रह्म, तू भी ब्रह्म, मेज भी ब्रह्म, रोटी भी ब्रह्म, चेतन भी ब्रह्म,
उससे कोई अंतर नहीं है। गलत ढंग से सोचने के कारण ही भौतिकवाद एवं अध्यात्मवाद के बीच संघर्ष से कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं। वास्तव में दोनों में कोई भेद नहीं है। मुझमें और हीनतम सुअर में केवल मात्रा का अंतर है-सुअर कम अभिव्यक्त हुआ, मैं अधिक। कभी मैं उससे बुरा हो जाता हूं, कभी सुअर मुझसे अच्छा रहता है।’’ (पृष्ठ 122)
दरअसल स्वामी जी कहना यह चाहते हैं कि मैं भी ब्रह्म, तू भी ब्रह्म, मेज भी ब्रह्म, रोटी भी ब्रह्म, चेतन भी ब्रह्म,