अध्यात्मवादी भी ब्रह्म और भौतिकवादी भी ब्रह्म-फिर भेद कहां रहा, सब एक ही माया है। पर अंत में उन्होंने जो उपमा ला खड़ी की, वह उनकी परिष्कृत काव्यमय शैली में दूध में मक्खी-सी आ पड़ी। यों कह लीजिए कि उससे सारा गुड़ गोबर हो गया। इस समन्वय को भौतिकवादी तो कबूलेंगे ही नहीं, डर है कि अध्यात्मवादी भी नहीं कबूलेंगे।
वेदान्तियों ने कहां स्वीकारा? गुरू-भाइयों ने उनके जीवन ही में विरोध शुरू कर दिया था। लिखा हैः
‘‘एक दिन सायंकाल
अध्यात्मवादी भी ब्रह्म और भौतिकवादी भी ब्रह्म-फिर भेद कहां रहा, सब एक ही माया है। पर अंत में उन्होंने जो उपमा ला खड़ी की, वह उनकी परिष्कृत काव्यमय शैली में दूध में मक्खी-सी आ पड़ी। यों कह लीजिए कि उससे सारा गुड़ गोबर हो गया। इस समन्वय को भौतिकवादी तो कबूलेंगे ही नहीं, डर है कि अध्यात्मवादी भी नहीं कबूलेंगे।
वेदान्तियों ने कहां स्वीकारा? गुरू-भाइयों ने उनके जीवन ही में विरोध शुरू कर दिया था। लिखा हैः
‘‘एक दिन सायंकाल