पर जब उस गुरू-भाई ने यह कहा कि लोकहित के उद्देश्य से मठ, मिशन, वेदान्त समिति, सेवाश्रम आदि की स्थापना करने का जो संकल्प आप कर रहे हैं, स्वदेश पे्रम के बीच में से मानव-सेवा के व्रत का जो प्रचार कर रहे हैं, वह सब पाश्चात्य आदर्श जैसा लगता है, तब वे गरजकर बोले, ‘क्या तुम समझते हो कि श्री रामकृष्ण
147 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
को तुमने मेरे से भी अधिक समझा है? क्या तुम समझते हो कि ज्ञान शुष्क पांडित्य मात्र है-जो हृदय
पर जब उस गुरू-भाई ने यह कहा कि लोकहित के उद्देश्य से मठ, मिशन, वेदान्त समिति, सेवाश्रम आदि की स्थापना करने का जो संकल्प आप कर रहे हैं, स्वदेश पे्रम के बीच में से मानव-सेवा के व्रत का जो प्रचार कर रहे हैं, वह सब पाश्चात्य आदर्श जैसा लगता है, तब वे गरजकर बोले, ‘क्या तुम समझते हो कि श्री रामकृष्ण
147 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
को तुमने मेरे से भी अधिक समझा है? क्या तुम समझते हो कि ज्ञान शुष्क पांडित्य मात्र है-जो हृदय