की कोमल वृत्िायों का विनाश कर एक शुष्क उपाय के अवलम्बन से उर्पाजन किया जाता है? तुम जिस भक्ति का उल्लेख कर रहे हो, वह मूर्खों की भावुकता मात्र है, जो मनुष्य को कापुरूष और कर्मविमुख कर डालती है।.... छोड़ो इन बातों को। कौन तुम्हारे श्री रामकृष्ण को चाहता है? शास्त्र क्या कह रहे हैं या नहीं कह रहे हैं, कौन सुनता है? यदि मैं घोर तमोगुण में डूबे हुए अपने स्वदेशवासियों को कर्मयोग के द्वारा अणुप्राणित कर वास्तविक मनुष्य की तरह अपने पैरों पर खड़ा कर देने में समर्थ हूं,
की कोमल वृत्िायों का विनाश कर एक शुष्क उपाय के अवलम्बन से उर्पाजन किया जाता है? तुम जिस भक्ति का उल्लेख कर रहे हो, वह मूर्खों की भावुकता मात्र है, जो मनुष्य को कापुरूष और कर्मविमुख कर डालती है।.... छोड़ो इन बातों को। कौन तुम्हारे श्री रामकृष्ण को चाहता है? शास्त्र क्या कह रहे हैं या नहीं कह रहे हैं, कौन सुनता है? यदि मैं घोर तमोगुण में डूबे हुए अपने स्वदेशवासियों को कर्मयोग के द्वारा अणुप्राणित कर वास्तविक मनुष्य की तरह अपने पैरों पर खड़ा कर देने में समर्थ हूं,