हम लोगों ने अपना आधा जीवन विश्वविद्यालयों में बिता दिया है, अतः हमारा मन दूसरों के विचारों से भर गया है।’’
-विवेकानन्द
नरेन्द्रनाथ जब चैदह बरस का था तो उसे पेट का भयंकर रोग हुुआ। यह रोग कई दिन तक रहा और इससे शरीर सूखकर कांटा हो गया। उस समय उसके पिता अपने काम से रायपुर में थे और उन्हें वहां अभी काफी दिन रहना था। इस ख्याल से कि हवा बदलने से स्वास्थ्य ठीक हो जायेगा, उन्होंने परिवार के लोगों को भी रायपुर बुला लिया। 1877 में नरेन्द्र अपने पिता के पास रायपुर पहुंचे।
हम लोगों ने अपना आधा जीवन विश्वविद्यालयों में बिता दिया है, अतः हमारा मन दूसरों के विचारों से भर गया है।’’
-विवेकानन्द
नरेन्द्रनाथ जब चैदह बरस का था तो उसे पेट का भयंकर रोग हुुआ। यह रोग कई दिन तक रहा और इससे शरीर सूखकर कांटा हो गया। उस समय उसके पिता अपने काम से रायपुर में थे और उन्हें वहां अभी काफी दिन रहना था। इस ख्याल से कि हवा बदलने से स्वास्थ्य ठीक हो जायेगा, उन्होंने परिवार के लोगों को भी रायपुर बुला लिया। 1877 में नरेन्द्र अपने पिता के पास रायपुर पहुंचे।