तो मैं आनन्द के साथ लाख-लाख बार नरक जाऊंगा। मैं तुम्हारे रामकृष्ण या अन्य किसी का चेला नहीं हूं। जो लोग अपनी भक्ति-मुक्ति की कामना को छोड़ दरिद्र-नारायण की सेवा में जीवन को उत्सग्रित करेंगे-मैं उन्हीं का चेला-भृत्य, क्रीतदास हूं।’’ (विवेकानन्द-चरित, पृष्ठ 366)
रामकृष्ण परमहंस के संदेश ‘यत्र जीव तत्र शिव’-जीव की सेवा करो का अर्थ विवेकानन्द ही समझ पाए थे और यह बात भी वही समझ पाए थे कि उनके गुरू ‘ऊपर से भक्त और भीतर से
तो मैं आनन्द के साथ लाख-लाख बार नरक जाऊंगा। मैं तुम्हारे रामकृष्ण या अन्य किसी का चेला नहीं हूं। जो लोग अपनी भक्ति-मुक्ति की कामना को छोड़ दरिद्र-नारायण की सेवा में जीवन को उत्सग्रित करेंगे-मैं उन्हीं का चेला-भृत्य, क्रीतदास हूं।’’ (विवेकानन्द-चरित, पृष्ठ 366)
रामकृष्ण परमहंस के संदेश ‘यत्र जीव तत्र शिव’-जीव की सेवा करो का अर्थ विवेकानन्द ही समझ पाए थे और यह बात भी वही समझ पाए थे कि उनके गुरू ‘ऊपर से भक्त और भीतर से