ज्ञानी थे।’ इसलिए विवेकानन्द ही ने गुरू से विरासत में मिले खोल का विस्तार और ज्ञान का विकास किया। उनके ये गुरू-भाई रामकृष्ण के संदेश को समझने और खोल के भीतर झांकने में असमर्थ थे और उनके लिए भक्ति-मुक्ति-मूर्खतापूर्ण भावुकता ही सब कुछ थी। इसलिए उन्हें विवेकानन्द का देश सेवा और जनसेवा का प्राणान्त प्रण पाश्चात्य आदर्श जैसा जान पड़ना स्वाभाविक था। जाने-अनजाने शासक-शोषण का हित-पोषण करने वाले ऐसे ही लोगों ने रामकृष्ण ही के नहीं,
ज्ञानी थे।’ इसलिए विवेकानन्द ही ने गुरू से विरासत में मिले खोल का विस्तार और ज्ञान का विकास किया। उनके ये गुरू-भाई रामकृष्ण के संदेश को समझने और खोल के भीतर झांकने में असमर्थ थे और उनके लिए भक्ति-मुक्ति-मूर्खतापूर्ण भावुकता ही सब कुछ थी। इसलिए उन्हें विवेकानन्द का देश सेवा और जनसेवा का प्राणान्त प्रण पाश्चात्य आदर्श जैसा जान पड़ना स्वाभाविक था। जाने-अनजाने शासक-शोषण का हित-पोषण करने वाले ऐसे ही लोगों ने रामकृष्ण ही के नहीं,