विवेकानन्द के भी सिर्फ खोल ही की मान-प्रतिष्ठा बढ़ाई और उस पर मूर्खतापूर्ण भावुकता की नई-नई परतें चढ़ाईं, लेकिन इन दोनों महापुरूषों के ज्ञान को मोटी-मोटी पुस्तकों और स्मारकों में दफना दिया। दफना इसलिए दिया कि विवेकानन्द हमारे राष्ट्रीय चिंतन को उन्नीसवीं सदी के अंत तक विकसित करके भौतिकवाद के कगार पर ले आए थे, उसे अब और आगे बढ़ाना शोषण की इस व्यवस्था के लिए खतरे का सिगनल है, जिस पर भक्ति-मुक्ति का दर्शन टिका है। लेकिन अगर हमें देश को वर्तमान स्थिति से आगे ले जाना है,
विवेकानन्द के भी सिर्फ खोल ही की मान-प्रतिष्ठा बढ़ाई और उस पर मूर्खतापूर्ण भावुकता की नई-नई परतें चढ़ाईं, लेकिन इन दोनों महापुरूषों के ज्ञान को मोटी-मोटी पुस्तकों और स्मारकों में दफना दिया। दफना इसलिए दिया कि विवेकानन्द हमारे राष्ट्रीय चिंतन को उन्नीसवीं सदी के अंत तक विकसित करके भौतिकवाद के कगार पर ले आए थे, उसे अब और आगे बढ़ाना शोषण की इस व्यवस्था के लिए खतरे का सिगनल है, जिस पर भक्ति-मुक्ति का दर्शन टिका है। लेकिन अगर हमें देश को वर्तमान स्थिति से आगे ले जाना है,