तो राष्ट्रीय चिंतन को, वे जहां पहुंचाकर छोड़कर गए हैं, उससे आगे ले जाना आवश्यक है।
अतएव ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्वान्त द्वारा गूदे को खोल से अलग करके यह देखेंगे कि विवेकानन्द हमारे राष्ट्रीय चिंतन को किस बिन्दु तक ले आए और उसे अब क्यों कर आगे बढ़ना है?
इसके लिए हमें उनके चिंतन के अंतर्विरोध को समझना होगा, जो वास्तव में उनका अपना नहीं उस उभरते हुए बुर्जुवा वर्ग का अंतर्विरोध है, जिसके वे प्रवक्ता थे।
148 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
तो राष्ट्रीय चिंतन को, वे जहां पहुंचाकर छोड़कर गए हैं, उससे आगे ले जाना आवश्यक है।
अतएव ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्वान्त द्वारा गूदे को खोल से अलग करके यह देखेंगे कि विवेकानन्द हमारे राष्ट्रीय चिंतन को किस बिन्दु तक ले आए और उसे अब क्यों कर आगे बढ़ना है?
इसके लिए हमें उनके चिंतन के अंतर्विरोध को समझना होगा, जो वास्तव में उनका अपना नहीं उस उभरते हुए बुर्जुवा वर्ग का अंतर्विरोध है, जिसके वे प्रवक्ता थे।
148 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द