योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

अधिक अभिव्यक्त है। कभी चींटी की आत्मा सुअर और सुअर की श्रेष्ठतम मनुष्य बन जाएगी।

वह कैसे?

मन वह दर्पण है जिसमें आत्मा अपने को प्रतिबिम्बित करती है, ‘‘जैसे-जैसे मन परिवर्तित होता है, उसका रूप विकसित एवं अधिकाधिक निर्मल-सा होता जाता है और वह आत्मा का अधिक उत्तम प्रतिबिम्ब देने लगता है। यह क्रम इसी प्रकार चलता रहता है और अंततः वह इतना शुद्व हो जाता है कि वह आत्मा के गुण का पूर्ण प्रतिबिम्बन कर सकता है, तब आत्मा मुक्त हो जाती हैं’’ (वही, पृष्ठ 97)


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अधिक अभिव्यक्त है। कभी चींटी की आत्मा सुअर और सुअर की श्रेष्ठतम मनुष्य बन जाएगी।

वह कैसे?

मन वह दर्पण है जिसमें आत्मा अपने को प्रतिबिम्बित करती है, ‘‘जैसे-जैसे मन परिवर्तित होता है, उसका रूप विकसित एवं अधिकाधिक निर्मल-सा होता जाता है और वह आत्मा का अधिक उत्तम प्रतिबिम्ब देने लगता है। यह क्रम इसी प्रकार चलता रहता है और अंततः वह इतना शुद्व हो जाता है कि वह आत्मा के गुण का पूर्ण प्रतिबिम्बन कर सकता है, तब आत्मा मुक्त हो जाती हैं’’ (वही, पृष्ठ 97)


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