योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand



होने का आभास हो जाता है और वह सत्य से चरम सत्य-अपने ब्रह्मस्वरूप तक पहुंचने के लिए प्रकृति के विरूद्व संघर्ष करता है, जो पशु, पक्षी तथा दूसरे जीव नहीं करते। अतएव लिखा है, ‘‘हम प्रकृति के सहायक होकर नहीं जन्मे हैं। वरन् हम प्रकृति के विरोधी होकर जन्में हैं हम न बंधने वाले होकर भी व्यर्थ बंधे जा रहे हैं। यह मकान कहां से आया? प्रकृति ने तो दिया नहीं। प्रकृति कहती है, ‘जाओ, जंगल में जाकर रहो।’ मनुष्य कहता है, ‘नहीं, मैं


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होने का आभास हो जाता है और वह सत्य से चरम सत्य-अपने ब्रह्मस्वरूप तक पहुंचने के लिए प्रकृति के विरूद्व संघर्ष करता है, जो पशु, पक्षी तथा दूसरे जीव नहीं करते। अतएव लिखा है, ‘‘हम प्रकृति के सहायक होकर नहीं जन्मे हैं। वरन् हम प्रकृति के विरोधी होकर जन्में हैं हम न बंधने वाले होकर भी व्यर्थ बंधे जा रहे हैं। यह मकान कहां से आया? प्रकृति ने तो दिया नहीं। प्रकृति कहती है, ‘जाओ, जंगल में जाकर रहो।’ मनुष्य कहता है, ‘नहीं, मैं


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