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प्रकृति के विरूद्व अपने इस संघर्ष में मनुष्य उच्चतर से उच्चतर स्थिति को प्राप्त करता-श्रेष्ठ से श्रेष्ठकर बनता चला जाता है। अपने देवता-अपने उपास्य संबंधी उसकी धारणा भी उत्कृष्ट से उत्कृष्टतर होती चली जाती है। इस संघर्ष में उपासक और उपास्य दोनों निरन्तर बदलते आए हैं। लिखा है:
‘‘तुमसे पृथक् ईश्वर नहीं, यथार्थतः जो तुम हो-उससे श्रेष्ठतर ईश्वर नहीं है-सब ईश्वर या देवता ही तुम्हारी तुलना में क्षुद्रतर हैं, ईश्वर
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प्रकृति के विरूद्व अपने इस संघर्ष में मनुष्य उच्चतर से उच्चतर स्थिति को प्राप्त करता-श्रेष्ठ से श्रेष्ठकर बनता चला जाता है। अपने देवता-अपने उपास्य संबंधी उसकी धारणा भी उत्कृष्ट से उत्कृष्टतर होती चली जाती है। इस संघर्ष में उपासक और उपास्य दोनों निरन्तर बदलते आए हैं। लिखा है:
‘‘तुमसे पृथक् ईश्वर नहीं, यथार्थतः जो तुम हो-उससे श्रेष्ठतर ईश्वर नहीं है-सब ईश्वर या देवता ही तुम्हारी तुलना में क्षुद्रतर हैं, ईश्वर