यही कहता है कि मनुष्य ने अपनी कल्पना के अनुरूप ही ईश्वर की सृष्टि की है।
आदि मानव ने प्रकृति का जैसा भयंकर रूप देखा, वैसे ही देवताओं की सृष्टि की। जब निरकुंश राजा अपने को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि या प्रतिछाया कहता था तो ईश्वर स्वयं आकाश पर अर्थात् स्वर्ग में रहता था। जब लोकतन्त्र आया और हर एक को मताधिकार मिला तो ईश्वर भी न सिर्फ धरती पर उतर आया बल्कि हर एक के घट-घट में बस गया।
विवेकानन्द ने न्यूयार्क में ‘राजयोग’ पर भाषण देते हुए कहा था:
यही कहता है कि मनुष्य ने अपनी कल्पना के अनुरूप ही ईश्वर की सृष्टि की है।
आदि मानव ने प्रकृति का जैसा भयंकर रूप देखा, वैसे ही देवताओं की सृष्टि की। जब निरकुंश राजा अपने को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि या प्रतिछाया कहता था तो ईश्वर स्वयं आकाश पर अर्थात् स्वर्ग में रहता था। जब लोकतन्त्र आया और हर एक को मताधिकार मिला तो ईश्वर भी न सिर्फ धरती पर उतर आया बल्कि हर एक के घट-घट में बस गया।
विवेकानन्द ने न्यूयार्क में ‘राजयोग’ पर भाषण देते हुए कहा था: