‘‘सम्पूर्ण जगत् को वशीभूत करना और सारी प्रकृति पर अधिकार हासिल करना इस बृहत् कार्य ही को योगी अपना कर्त्तव्य समझते हैं वे एक ऐसी अवस्था में जाना चाहते हैं, जहां हम जिन्हें ‘प्रकृति के नियम’ कहते हैं, वे उन पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते, जिस अवस्था में वे उन सबको पार कर जाते हैं। तब वे आभ्यन्तरिक
150 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
और बाह्म प्रकृति पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेते हैं। मनुष्य जाति की उन्नति और सभ्यता इस प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति पर ही निर्भर है।’’
‘‘सम्पूर्ण जगत् को वशीभूत करना और सारी प्रकृति पर अधिकार हासिल करना इस बृहत् कार्य ही को योगी अपना कर्त्तव्य समझते हैं वे एक ऐसी अवस्था में जाना चाहते हैं, जहां हम जिन्हें ‘प्रकृति के नियम’ कहते हैं, वे उन पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते, जिस अवस्था में वे उन सबको पार कर जाते हैं। तब वे आभ्यन्तरिक
150 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
और बाह्म प्रकृति पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेते हैं। मनुष्य जाति की उन्नति और सभ्यता इस प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति पर ही निर्भर है।’’