वह एक दिन बिल्कुल विलीन हो जाएंगे।’’ (प्रथम खंड, पृष्ठ 43)
लेकिन भौतिकवादी पूछते हैं कि अगर मनुष्य प्रकृति के रिूद्व संघर्ष ही में परिष्कृत से परिष्कृततर होता चला जा रहा है और जैसा कि हम देख चुके हैं, जैसे-जैसे भौतिक परिस्थितियां बदल रही हैं, प्रकृति का विकास उत्तरोत्तर उच्चतर से उच्चतर संघातों की ओर अग्रसर हो रहा है, वैसे-वैसे मनुष्य के विचार भी बदलते तथा उत्कृष्ट से उत्कृष्टतर होते चले जा रहे हैं, तो उसमें आत्मा-परमात्मा के कल्पित पंख लगा देना क्यों आवश्यक है?
वह एक दिन बिल्कुल विलीन हो जाएंगे।’’ (प्रथम खंड, पृष्ठ 43)
लेकिन भौतिकवादी पूछते हैं कि अगर मनुष्य प्रकृति के रिूद्व संघर्ष ही में परिष्कृत से परिष्कृततर होता चला जा रहा है और जैसा कि हम देख चुके हैं, जैसे-जैसे भौतिक परिस्थितियां बदल रही हैं, प्रकृति का विकास उत्तरोत्तर उच्चतर से उच्चतर संघातों की ओर अग्रसर हो रहा है, वैसे-वैसे मनुष्य के विचार भी बदलते तथा उत्कृष्ट से उत्कृष्टतर होते चले जा रहे हैं, तो उसमें आत्मा-परमात्मा के कल्पित पंख लगा देना क्यों आवश्यक है?