योगियों को जब भूख लगती है तो वे गृहस्थ के द्वार पर जाकर क्यों अलख जगाते है क्यों उसी के नाम से पेट नहीं भर लेते? क्या ‘अलख-निरंजन’ कहकर वे अपनी यह पराजय स्वीकार नहीं करते कि हमने उसे बहुत खोजा, पर देखा नहीं-उसे देख पाना संभव नहीं?
किसी भी आदर्शवादी के पास इन और ऐसे ही अनेक प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं। उपनिषदों की आत्मा-संबंधी कथाओं में जो सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है, उसमें भी नचिकेता जब यम से पूछता है कि मृत्यु के बाद आत्मा रहती है या नहीं,
योगियों को जब भूख लगती है तो वे गृहस्थ के द्वार पर जाकर क्यों अलख जगाते है क्यों उसी के नाम से पेट नहीं भर लेते? क्या ‘अलख-निरंजन’ कहकर वे अपनी यह पराजय स्वीकार नहीं करते कि हमने उसे बहुत खोजा, पर देखा नहीं-उसे देख पाना संभव नहीं?
किसी भी आदर्शवादी के पास इन और ऐसे ही अनेक प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं। उपनिषदों की आत्मा-संबंधी कथाओं में जो सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है, उसमें भी नचिकेता जब यम से पूछता है कि मृत्यु के बाद आत्मा रहती है या नहीं,