पर उपनिषदों के अंधविश्वास और रहस्यवाद को अवश्य मानो और समझकर मानो कि यह एक ‘महान सत्य’ है।
क्या यह भक्ति-मुक्ति की मूर्खता को प्रश्रय देना नहीं है?
दरअसल मूर्खतापूर्ण भावुकता धर्म का अभिन्न अंग है। पर तर्क चूंकि विवेकानन्द के जीवन का सम्बल रहा है, चूंकि उनका चिंतन उस हद तक वैज्ञानिक था, जिस हद तक उभरते हुए बुर्जवा के उत्कृष्ट प्रवक्ता का होना सम्भव था और चूंकि उन्होंने वेदान्त दर्शन पर क्रम-विकास का सिद्वान्त लागू किया है,
पर उपनिषदों के अंधविश्वास और रहस्यवाद को अवश्य मानो और समझकर मानो कि यह एक ‘महान सत्य’ है।
क्या यह भक्ति-मुक्ति की मूर्खता को प्रश्रय देना नहीं है?
दरअसल मूर्खतापूर्ण भावुकता धर्म का अभिन्न अंग है। पर तर्क चूंकि विवेकानन्द के जीवन का सम्बल रहा है, चूंकि उनका चिंतन उस हद तक वैज्ञानिक था, जिस हद तक उभरते हुए बुर्जवा के उत्कृष्ट प्रवक्ता का होना सम्भव था और चूंकि उन्होंने वेदान्त दर्शन पर क्रम-विकास का सिद्वान्त लागू किया है,