इसलिए वे उसे अपने गुरू-भाइयों की तरह सहज में पचा नहीं पाते। ‘व्यावहारिक जीवन में वेदान्त’ भाषण में वे कहते हैं:
‘‘धर्म जो भी दावा करता है, तर्क की कसौटी पर उन सबकी परीक्षा करना आवश्यक है। धर्म यह दावा करता है कि वह तर्क द्वारा परीक्षित होना नहीं चाहता, यह कोई नहीं बतला सकता, तर्क के मानदंड के बिना किसी भी प्रकार का यथार्थ निर्णय धर्म के संबंध में भी नहीं दिया जा सकता। धर्म कुछ बीभत्स करने की आज्ञा दे सकता है।’’ (अष्टम खंड, पृष्ठ 43)
इसलिए वे उसे अपने गुरू-भाइयों की तरह सहज में पचा नहीं पाते। ‘व्यावहारिक जीवन में वेदान्त’ भाषण में वे कहते हैं:
‘‘धर्म जो भी दावा करता है, तर्क की कसौटी पर उन सबकी परीक्षा करना आवश्यक है। धर्म यह दावा करता है कि वह तर्क द्वारा परीक्षित होना नहीं चाहता, यह कोई नहीं बतला सकता, तर्क के मानदंड के बिना किसी भी प्रकार का यथार्थ निर्णय धर्म के संबंध में भी नहीं दिया जा सकता। धर्म कुछ बीभत्स करने की आज्ञा दे सकता है।’’ (अष्टम खंड, पृष्ठ 43)