धर्म के बीभत्स रूप का इतिहास साक्षी है, विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं। हमारे धर्म का अनर्थ यह है कि उसने हमें आत्मकेंद्रित बना दिया। विवेकानन्द खुद मानते हैं, ‘‘अब तक हमारे भारतीय धर्म का बड़ा दोष दो शब्दों के ज्ञान में निहित रहा है-संन्यास और मुक्ति। केवल मुक्ति की बात। गृहस्थ के लिए कुछ नहीं।’’ (वही, पृष्ठ 133)
दूसरे, भौतिकवाद भी अब द्वन्द्वात्मक तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद तक
152 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
विकसित
धर्म के बीभत्स रूप का इतिहास साक्षी है, विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं। हमारे धर्म का अनर्थ यह है कि उसने हमें आत्मकेंद्रित बना दिया। विवेकानन्द खुद मानते हैं, ‘‘अब तक हमारे भारतीय धर्म का बड़ा दोष दो शब्दों के ज्ञान में निहित रहा है-संन्यास और मुक्ति। केवल मुक्ति की बात। गृहस्थ के लिए कुछ नहीं।’’ (वही, पृष्ठ 133)
दूसरे, भौतिकवाद भी अब द्वन्द्वात्मक तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद तक
152 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
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