निर्माण भी रायपुर में हुआ। उस समय वहां कोई स्कूल नहीं था इसलिए विश्वनाथ बेटे को खुद ही घर पर पढ़ाया करते थे। उन्हें वहां न तो अदालत जाना होता था और न मुवक्किलों से माथा-पच्ची करनी पड़ती थी। फुरसत ही फुरसत थी। पाठ्य-पुस्तकों के अलावा वे नरेन्द्र को इतिहास, दर्शन और साहित्य संबंधी विभिन्न पुस्तकें पढ़ाने लगे। बेटे की ग्राह्म-शक्ति देखकर विश्वनाथ दंग रह गए और उन्हें पढ़ाने में आनन्द भी आने लगा। उन्होंने बड़े परिश्रम से जितना
निर्माण भी रायपुर में हुआ। उस समय वहां कोई स्कूल नहीं था इसलिए विश्वनाथ बेटे को खुद ही घर पर पढ़ाया करते थे। उन्हें वहां न तो अदालत जाना होता था और न मुवक्किलों से माथा-पच्ची करनी पड़ती थी। फुरसत ही फुरसत थी। पाठ्य-पुस्तकों के अलावा वे नरेन्द्र को इतिहास, दर्शन और साहित्य संबंधी विभिन्न पुस्तकें पढ़ाने लगे। बेटे की ग्राह्म-शक्ति देखकर विश्वनाथ दंग रह गए और उन्हें पढ़ाने में आनन्द भी आने लगा। उन्होंने बड़े परिश्रम से जितना