हैं कि अपने इस प्रयास में वे धर्म की चरम सीमा का अतिक्रमण कर जाते हैं। अतिक्रमण करना अनिवार्य था क्योंकि धर्म का विज्ञान से सामंजस्य मुमकिन नहीं। अतएव समष्टिपक्ष अर्थात् विज्ञान जब यह घोषणा करता है कि आत्मा की स्वतंत्रता भ्रम मात्र है, तब विवेकानन्द अपने धर्म के मूल तत्व, लेख में इसी सामंजस्य के चक्र में पढ़कर लिखते हैं:
‘‘अब एक ओर तो, स्वतंत्रता को भ्रम घोषित कर उसकी सत्ता की अस्वीकृति कोई समाधान नहीं, दसूरी ओर, हम
हैं कि अपने इस प्रयास में वे धर्म की चरम सीमा का अतिक्रमण कर जाते हैं। अतिक्रमण करना अनिवार्य था क्योंकि धर्म का विज्ञान से सामंजस्य मुमकिन नहीं। अतएव समष्टिपक्ष अर्थात् विज्ञान जब यह घोषणा करता है कि आत्मा की स्वतंत्रता भ्रम मात्र है, तब विवेकानन्द अपने धर्म के मूल तत्व, लेख में इसी सामंजस्य के चक्र में पढ़कर लिखते हैं:
‘‘अब एक ओर तो, स्वतंत्रता को भ्रम घोषित कर उसकी सत्ता की अस्वीकृति कोई समाधान नहीं, दसूरी ओर, हम