यह क्यों न कहें कि आवश्यकता अथवा बंधन अथवा कारण का विचार अज्ञानियों का एक भ्रम मात्र है। कोई भी सिद्वान्त जो विवेच्य तथ्यों में से उन सबको पहले काटकर अलग फेंक देता है, जो उनके अनुकूल नहीं पड़ते और तब अपने अनुकूल तथ्यों को लेकर समग्र की व्याख्या का दावा करता है, स्पष्टतः एक भा्रमक सिद्वान्त है-अशुद्व सिद्वान्त है। अतः हमारे लिए एकमात्र शेष मार्ग यही है कि हम स्वीकार करें कि प्रथमतः न शरीर स्वतंत्र है और न इच्छा ही, बल्कि
यह क्यों न कहें कि आवश्यकता अथवा बंधन अथवा कारण का विचार अज्ञानियों का एक भ्रम मात्र है। कोई भी सिद्वान्त जो विवेच्य तथ्यों में से उन सबको पहले काटकर अलग फेंक देता है, जो उनके अनुकूल नहीं पड़ते और तब अपने अनुकूल तथ्यों को लेकर समग्र की व्याख्या का दावा करता है, स्पष्टतः एक भा्रमक सिद्वान्त है-अशुद्व सिद्वान्त है। अतः हमारे लिए एकमात्र शेष मार्ग यही है कि हम स्वीकार करें कि प्रथमतः न शरीर स्वतंत्र है और न इच्छा ही, बल्कि