योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

मन और शरीर दोनों से परे निश्चय ही कोई ऐसा तथ्य होगा जो स्वतंत्र है और...(नवम खंड, पृष्ठ 220)

सोचिए, इस ‘होगा’ का क्या अर्थ है? यह विवेकानन्द का अपना तर्क-वितर्क है। आखिर वे इस कदर दुविधा में पड़ जाते हैं कि ‘और’ से आगे कुछ कहते ही नहीं बन पड़ता। कहने को कुछ था ही नहीं। जब वे इस प्रकार दुविधा में पड़े हुए थे, हमारा तत्कालीन राष्ट्र कवि चकबस्त समष्टि-पक्ष की घोषणा का निस्संकोच समर्थन करता है:

ज़िन्दगी क्या है उनासर में ज़हूरे-तरतीब,


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मन और शरीर दोनों से परे निश्चय ही कोई ऐसा तथ्य होगा जो स्वतंत्र है और...(नवम खंड, पृष्ठ 220)

सोचिए, इस ‘होगा’ का क्या अर्थ है? यह विवेकानन्द का अपना तर्क-वितर्क है। आखिर वे इस कदर दुविधा में पड़ जाते हैं कि ‘और’ से आगे कुछ कहते ही नहीं बन पड़ता। कहने को कुछ था ही नहीं। जब वे इस प्रकार दुविधा में पड़े हुए थे, हमारा तत्कालीन राष्ट्र कवि चकबस्त समष्टि-पक्ष की घोषणा का निस्संकोच समर्थन करता है:

ज़िन्दगी क्या है उनासर में ज़हूरे-तरतीब,


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