विवेकानन्द ने इस बात पर बार-बार जोर दिया है कि हमारे राष्ट्र का मेरूदण्ड-रीढ़ की हड्डी-धर्म है। दरअसल धर्म किसी प्राच्य अथवा पाश्चात्य राष्ट्र का मेरूदंड नहीं, हमारा भी नहीं और न इस पर हमारा कोई विशेषधिकार है। इस विषय सम्बंधी माक्र्स की व्याख्या यह है-तथ्यों की मिथ्या व्याख्या का नाम धर्म है। हम देख चुके हैं कि मनुष्य ने प्रत्येक देश में प्रकृति के विरूद्व अपने संघर्ष में जहां प्रकृति को अपने कर्म द्वारा बदला है, वहां कल्पना से भी काम लिया है,
विवेकानन्द ने इस बात पर बार-बार जोर दिया है कि हमारे राष्ट्र का मेरूदण्ड-रीढ़ की हड्डी-धर्म है। दरअसल धर्म किसी प्राच्य अथवा पाश्चात्य राष्ट्र का मेरूदंड नहीं, हमारा भी नहीं और न इस पर हमारा कोई विशेषधिकार है। इस विषय सम्बंधी माक्र्स की व्याख्या यह है-तथ्यों की मिथ्या व्याख्या का नाम धर्म है। हम देख चुके हैं कि मनुष्य ने प्रत्येक देश में प्रकृति के विरूद्व अपने संघर्ष में जहां प्रकृति को अपने कर्म द्वारा बदला है, वहां कल्पना से भी काम लिया है,