योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

अपने अल्प ज्ञान के कारण तथ्यों की मिथ्या व्याख्या की है। जैसे-जैसे समाज का विकास हुआ और जैसे-जैसे उत्पादन संघर्ष, वर्ग संघर्ष और वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मनुष्य ने तथ्यों को जितना समझा, उसके वास्तविक ज्ञान की मात्रा उतनी ही बढ़ती गई और वृद्वि की इसी मात्रा के अनुपात से मिथ्या धारणा अर्थात् धर्म मे से असार हटता गया और उसमें सार तत्व जुड़ता चला गया। अतएव जैसे-जैसे समाज का विकास होता रहा, उत्पादन संबंध तथा आवश्यकताएं बदलती रहीं,


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अपने अल्प ज्ञान के कारण तथ्यों की मिथ्या व्याख्या की है। जैसे-जैसे समाज का विकास हुआ और जैसे-जैसे उत्पादन संघर्ष, वर्ग संघर्ष और वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मनुष्य ने तथ्यों को जितना समझा, उसके वास्तविक ज्ञान की मात्रा उतनी ही बढ़ती गई और वृद्वि की इसी मात्रा के अनुपात से मिथ्या धारणा अर्थात् धर्म मे से असार हटता गया और उसमें सार तत्व जुड़ता चला गया। अतएव जैसे-जैसे समाज का विकास होता रहा, उत्पादन संबंध तथा आवश्यकताएं बदलती रहीं,


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