हम विवेकानन्द के चिंतन से अपने चिंतन का सूत्र जोड़ें और जिस रास्ते से हम भटक गए हैं, उस पर वापस आएं।
हम कह चुके हैं कि कर्मवाद और मायावाद वेदान्त दर्शन के आधारिक स्तम्भ है। अब देखना यह है कि सामाजिक जीवन में उनका व्यावहारिक रूप क्या है और देश की भौतिक तथा आर्थिक स्थिति से उनका द्वन्द्वात्मक संबंध क्या है?
गीता तथा वेदान्त के दूसरे गं्रथों में पुनर्जन्म अथवा कर्मवाद की कुछ भी व्याख्या की गई हो, पर इसकी उत्पत्िा का भौतिक
हम विवेकानन्द के चिंतन से अपने चिंतन का सूत्र जोड़ें और जिस रास्ते से हम भटक गए हैं, उस पर वापस आएं।
हम कह चुके हैं कि कर्मवाद और मायावाद वेदान्त दर्शन के आधारिक स्तम्भ है। अब देखना यह है कि सामाजिक जीवन में उनका व्यावहारिक रूप क्या है और देश की भौतिक तथा आर्थिक स्थिति से उनका द्वन्द्वात्मक संबंध क्या है?
गीता तथा वेदान्त के दूसरे गं्रथों में पुनर्जन्म अथवा कर्मवाद की कुछ भी व्याख्या की गई हो, पर इसकी उत्पत्िा का भौतिक