आधार यह है कि व्यक्तिगत सम्पत्िा के साथ-साथ भारतीय समाज वर्गों ही में नहीं वर्णों (जातियों) में भी विभाजित हुआ। ब्राह्मण और क्षत्रिय सवर्ण तथा श्रेष्ठ माने जाते थे और उन्हें ही जीवन की सुख-सुविधाएं प्राप्त थी, शेष श्रम करने वाले सभी वर्णहीन अथवा शुद्र माने जाते थे और सब कुछ पैदा करने के बावजुद वे भूख और दरिद्रता का जीवन जी रहे थे। कर्मवाद के सिद्वान्त ने शोषक और शोषित दोनों को सन्तुष्ट किया। सवर्णों ने यह मान लिया कि
आधार यह है कि व्यक्तिगत सम्पत्िा के साथ-साथ भारतीय समाज वर्गों ही में नहीं वर्णों (जातियों) में भी विभाजित हुआ। ब्राह्मण और क्षत्रिय सवर्ण तथा श्रेष्ठ माने जाते थे और उन्हें ही जीवन की सुख-सुविधाएं प्राप्त थी, शेष श्रम करने वाले सभी वर्णहीन अथवा शुद्र माने जाते थे और सब कुछ पैदा करने के बावजुद वे भूख और दरिद्रता का जीवन जी रहे थे। कर्मवाद के सिद्वान्त ने शोषक और शोषित दोनों को सन्तुष्ट किया। सवर्णों ने यह मान लिया कि