वर्ण व्यवस्था हमारे ही समाज संगठन का विशेष रूप है, इसलिए कर्मवाद
156 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
का सिद्वान्त भी हमारे ही देश में विकसित हुआ। दूसरे देशों के धार्मिक विचार उनकी विशेष भौतिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित हुए। लिखा है:
‘‘आत्मा की प्राचीनतम कल्पना इस स्थूल शरीर में एक सूक्ष्म शरीर की थी। स्थूल के अगोचर हो जाने पर सूक्ष्म गोचर होता है। मिÛ देश में सूक्ष्म शरीर का भी निधन हो जाता है। स्थूल शरीर के बिखर
वर्ण व्यवस्था हमारे ही समाज संगठन का विशेष रूप है, इसलिए कर्मवाद
156 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
का सिद्वान्त भी हमारे ही देश में विकसित हुआ। दूसरे देशों के धार्मिक विचार उनकी विशेष भौतिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित हुए। लिखा है:
‘‘आत्मा की प्राचीनतम कल्पना इस स्थूल शरीर में एक सूक्ष्म शरीर की थी। स्थूल के अगोचर हो जाने पर सूक्ष्म गोचर होता है। मिÛ देश में सूक्ष्म शरीर का भी निधन हो जाता है। स्थूल शरीर के बिखर