योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

और इसके अलावा चन्द्रलोक आदि कितने ही स्ािानों की कल्पना की गई है, जिनमें आत्मा को अपने कर्मों के अनुसार रहना पड़ता है। लेकिन यह द्वैतवादियों की कल्पना है, विवेकानन्द का इसमें विश्वास नहीं है। वे लिखते है:

‘‘स्वर्ग तथा अन्य स्ािानों से संबंधित धारणाएं भी हैं, किन्तु उन्हें द्वितीय श्रेणी का माना जाता है। स्वर्ग की धारणा को निम्न स्तरीए माना जाता है। उनका उद्भव भोग की एक स्थिति पाने की इच्छा से होता है। हम मूर्खतापूर्ण


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और इसके अलावा चन्द्रलोक आदि कितने ही स्ािानों की कल्पना की गई है, जिनमें आत्मा को अपने कर्मों के अनुसार रहना पड़ता है। लेकिन यह द्वैतवादियों की कल्पना है, विवेकानन्द का इसमें विश्वास नहीं है। वे लिखते है:

‘‘स्वर्ग तथा अन्य स्ािानों से संबंधित धारणाएं भी हैं, किन्तु उन्हें द्वितीय श्रेणी का माना जाता है। स्वर्ग की धारणा को निम्न स्तरीए माना जाता है। उनका उद्भव भोग की एक स्थिति पाने की इच्छा से होता है। हम मूर्खतापूर्ण


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