इस प्रकार वे सदा एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न की ओर भागते रहेंगे।’’ (अष्टम खंड, पृष्ठ 99)
मतलब यह कि मनुष्य की चेतना उसकी सामाजिक स्थिति से निर्धारित होती है। जिन्हें इस लोग में सुख-भोग के साधन प्राप्त थे, उन्हीं लोगों ने अपने लिए परलोक में भी स्वर्ग की कल्पना की और जो लोग इन साधनों से वंचित थे, ताकि वे उनके सुख-भोग मंे बाधा न डालें, व्यक्तिगत सम्पत्िा को हानि पहुंचाने वाले सभी कर्मों
157 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
इस प्रकार वे सदा एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न की ओर भागते रहेंगे।’’ (अष्टम खंड, पृष्ठ 99)
मतलब यह कि मनुष्य की चेतना उसकी सामाजिक स्थिति से निर्धारित होती है। जिन्हें इस लोग में सुख-भोग के साधन प्राप्त थे, उन्हीं लोगों ने अपने लिए परलोक में भी स्वर्ग की कल्पना की और जो लोग इन साधनों से वंचित थे, ताकि वे उनके सुख-भोग मंे बाधा न डालें, व्यक्तिगत सम्पत्िा को हानि पहुंचाने वाले सभी कर्मों
157 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द