विवेकानन्द के पिता भोगवादी थे, धर्म उनके लिए गौण वस्तु थी। इसलिए चाहे उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को गुरू बनाकर दूसरा जन्म धारण किया, पर इसके बावजूद पिता की विरासत को वे झटक नहीं पाए। क्षत्रिए कुल के चंचल नरेन्द्र ही बने रहे।
बुद्व के बारे में एक कहानी है कि बुद्व ने मानव-जाति के परित्राता के रूप में जन्म लिया, किन्तु जब वह राज-प्रसाद की विलासिता में अपने को भूल गया,
158 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
तब उसे जगाने के लिए देवदूत ने एक गीत गाया,
विवेकानन्द के पिता भोगवादी थे, धर्म उनके लिए गौण वस्तु थी। इसलिए चाहे उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को गुरू बनाकर दूसरा जन्म धारण किया, पर इसके बावजूद पिता की विरासत को वे झटक नहीं पाए। क्षत्रिए कुल के चंचल नरेन्द्र ही बने रहे।
बुद्व के बारे में एक कहानी है कि बुद्व ने मानव-जाति के परित्राता के रूप में जन्म लिया, किन्तु जब वह राज-प्रसाद की विलासिता में अपने को भूल गया,
158 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
तब उसे जगाने के लिए देवदूत ने एक गीत गाया,