जिसका मर्मार्थ इस प्रकार है: ‘‘हम एक प्रवाह में बहते चले जा रहे हैं, हम अविरत रूप से परिवर्तित हो रहे हैं। कहीं निवृत्िा नहीं है, कहीं विराम नहीं हैं’’ बुद्व ही को, जो एक राजकुमार था, मृत्यु के भय ने विचलित किया और बुद्व ही ने घर त्याग करने के बाद, इस क्षण-क्षण परिवर्तित हो रहे संसार में अमरत्व की-इच्छाओं का दमन करके निर्वाण हासिल करने की, बात सोची।
आत्मा-परमाप्मा में आस्था न होने के बावजूद बुद्व ने भी पुर्नजन्म को
जिसका मर्मार्थ इस प्रकार है: ‘‘हम एक प्रवाह में बहते चले जा रहे हैं, हम अविरत रूप से परिवर्तित हो रहे हैं। कहीं निवृत्िा नहीं है, कहीं विराम नहीं हैं’’ बुद्व ही को, जो एक राजकुमार था, मृत्यु के भय ने विचलित किया और बुद्व ही ने घर त्याग करने के बाद, इस क्षण-क्षण परिवर्तित हो रहे संसार में अमरत्व की-इच्छाओं का दमन करके निर्वाण हासिल करने की, बात सोची।
आत्मा-परमाप्मा में आस्था न होने के बावजूद बुद्व ने भी पुर्नजन्म को