माना। गीता के अनुसार आत्मा एक के बाद एक जन्म धारण करती है, लेकिन बौद्व मत के अनुसार एक जन्म के संस्कार दूसरे जन्म में जाते हैं और दूसरा जन्म पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार होता है। नाक सीधे हाथ से पकड़ो या उल्टे से, बात एक ही है।
वैदिक समाज-व्यवस्था में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ के बाद अन्तिम आयु में संन्यास धारण करने की प्रथा थी। युवावस्था में संन्यास लेने की प्रथा बुद्व ने चलाई अतएव और सब बातें गौण, मोक्ष-प्राप्ति
माना। गीता के अनुसार आत्मा एक के बाद एक जन्म धारण करती है, लेकिन बौद्व मत के अनुसार एक जन्म के संस्कार दूसरे जन्म में जाते हैं और दूसरा जन्म पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार होता है। नाक सीधे हाथ से पकड़ो या उल्टे से, बात एक ही है।
वैदिक समाज-व्यवस्था में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ के बाद अन्तिम आयु में संन्यास धारण करने की प्रथा थी। युवावस्था में संन्यास लेने की प्रथा बुद्व ने चलाई अतएव और सब बातें गौण, मोक्ष-प्राप्ति