ही जीवन का मुख्य ध्येय बन गई। इससे जो हानि हुई इतिहास उसका साक्षी है। विवेकानन्द कहते हैं‘‘ बुद्व ने हमारा सर्वनाश किया और ईसा ने ग्रीस और रोम का।’’
विवेकानन्द ने बड़ी विनम्रता से अपने को बुद्व का दास, अनुदास भी कहा है, उसे विशाल, उदार और अवतार माना है। लेकिन जब उनका चिंतन अधिक वैज्ञानिक, अधिक वस्तुपरक हुआ, तब उन्होंने बुद्व के द्वारा देश के सर्वनाश की बात कही और इसकी व्याख्या यों की:
‘‘जिस समय बौद्व राज्य में एक-एक मठ में एक-एक लाख साधु हो गए थे,
ही जीवन का मुख्य ध्येय बन गई। इससे जो हानि हुई इतिहास उसका साक्षी है। विवेकानन्द कहते हैं‘‘ बुद्व ने हमारा सर्वनाश किया और ईसा ने ग्रीस और रोम का।’’
विवेकानन्द ने बड़ी विनम्रता से अपने को बुद्व का दास, अनुदास भी कहा है, उसे विशाल, उदार और अवतार माना है। लेकिन जब उनका चिंतन अधिक वैज्ञानिक, अधिक वस्तुपरक हुआ, तब उन्होंने बुद्व के द्वारा देश के सर्वनाश की बात कही और इसकी व्याख्या यों की:
‘‘जिस समय बौद्व राज्य में एक-एक मठ में एक-एक लाख साधु हो गए थे,