उस समय देश ठीक नाश होने की ओर अग्रसर हुआ था। बौद्व, ईसाई, मुसलमान, जैन सभी का यह भ्रम है कि सभी के लिए एक कानून और एक नियम है। यह बिल्कुल गलत है, जाति और व्यक्ति के प्रकृति-भेद से शिक्षा-व्यवहार के नियम सभी अलग-अलग हैं, बलपूर्वक उन्हें एक करने से क्या होगा? बौद्व कहते हैं, मोक्ष के सदृश और क्या है, सब दुनिया मुक्ति-प्राप्ति करे, तो क्या कभी ऐसा हो सकता है, तुम गृहस्थ हो, तुम्हारे लिए वे सब बातें बहुत आवश्यक नहीं हैं, तुम अपने धर्म का आचरण करो,
उस समय देश ठीक नाश होने की ओर अग्रसर हुआ था। बौद्व, ईसाई, मुसलमान, जैन सभी का यह भ्रम है कि सभी के लिए एक कानून और एक नियम है। यह बिल्कुल गलत है, जाति और व्यक्ति के प्रकृति-भेद से शिक्षा-व्यवहार के नियम सभी अलग-अलग हैं, बलपूर्वक उन्हें एक करने से क्या होगा? बौद्व कहते हैं, मोक्ष के सदृश और क्या है, सब दुनिया मुक्ति-प्राप्ति करे, तो क्या कभी ऐसा हो सकता है, तुम गृहस्थ हो, तुम्हारे लिए वे सब बातें बहुत आवश्यक नहीं हैं, तुम अपने धर्म का आचरण करो,