में जैनी ही सबसे अधिक संग्रह करते हैं और चींटियों को आटा खिलाने और पानी छानकर पीने वाले जैनी ही सूदखोरी मुनाफाखोरी इत्यादि घृणित कर्म निस्संकोच करते हैं।
मतलब यह कि सिद्वान्त और व्यवहार में ज़मीन और आसमान का अन्तर है। शोषक और शासक वर्ग ने एक बुद्व, एक महावीर और एक भर्तृहरि-अपने उच्च वर्ग के पांच-दस व्यक्तियों को त्याग और वैराग्य के आदर्श बनाकर प्रस्तुत किया, पूजा कराई और व्यवहार जो था, उसके बारे में विवेकानन्द लिखते हैं:
में जैनी ही सबसे अधिक संग्रह करते हैं और चींटियों को आटा खिलाने और पानी छानकर पीने वाले जैनी ही सूदखोरी मुनाफाखोरी इत्यादि घृणित कर्म निस्संकोच करते हैं।
मतलब यह कि सिद्वान्त और व्यवहार में ज़मीन और आसमान का अन्तर है। शोषक और शासक वर्ग ने एक बुद्व, एक महावीर और एक भर्तृहरि-अपने उच्च वर्ग के पांच-दस व्यक्तियों को त्याग और वैराग्य के आदर्श बनाकर प्रस्तुत किया, पूजा कराई और व्यवहार जो था, उसके बारे में विवेकानन्द लिखते हैं: