‘‘राज्य-रक्षा, अपने भोग-विलास, अपने परिवार की पुष्टि और सबसे बढ़कर पूरोहितों की तुष्टि के लिए राजा लोग सूर्य की भांति अपनी प्रजा का धन सोख लिया करते थे। बेचारे वैश्य लोग ही उनकी रसद और दुधारू गाय थे।’’ (नवम खंड, पृष्ठ 202)
बुद्व का कथन है, ‘यदि यह दृश्य जगत न हो तो हमारी महाकरूणा किसके लिए सक्रिए हो।’’ लेकिन इस महाकरूणा के महान आदर्श ने मेहनतकश जनता को जिस दयनीय अवस्था को पहुंचा दिया है, विवेकानन्द ने यूरोप से लौटकर कुंभकरण के भाषण में उनका यों वर्णन कियाः
‘‘राज्य-रक्षा, अपने भोग-विलास, अपने परिवार की पुष्टि और सबसे बढ़कर पूरोहितों की तुष्टि के लिए राजा लोग सूर्य की भांति अपनी प्रजा का धन सोख लिया करते थे। बेचारे वैश्य लोग ही उनकी रसद और दुधारू गाय थे।’’ (नवम खंड, पृष्ठ 202)
बुद्व का कथन है, ‘यदि यह दृश्य जगत न हो तो हमारी महाकरूणा किसके लिए सक्रिए हो।’’ लेकिन इस महाकरूणा के महान आदर्श ने मेहनतकश जनता को जिस दयनीय अवस्था को पहुंचा दिया है, विवेकानन्द ने यूरोप से लौटकर कुंभकरण के भाषण में उनका यों वर्णन कियाः